दोषी कौन ?







भारत में एक औरत हर 13 मिनट में बलात्कार की शिकार होती है। (NCRB) यूं तो औरत को न्याय दिलवाने के लिए कई कानून है परंतु पूरी न्याय व्यवस्था उसकी कब्रगाह बन कर रह जाती है। तमाम समानता, स्वतंत्रता की बातों के बावजूद भी उसकी स्थिति दयनीय ही है। केंद्र द्वारा 2007 के रिपोर्ट के अनुसार लगभग 54% महिलाएं पारिवारिक समारोह व उत्सवों में बलात्कार एवं यौन शोषण का शिकार हुई है।

बलात्कार यौन शोषण एवं कानून की लड़ाई अगर वो जैसे तैसे जीत भी जाती है तो, वह समाज से हार जाती है। पुरुष अपनी यौन कुंठाओ के साथ-साथ प्रतिशोध के कारण भी क्रूर और नृशंस बलात्कार करने से बाज नही आता। वह अपनी हवस का शिकार 8 महीने की नवजात, 8 साल की अबोध बालिका,18 साल की युवती, 40 साल की वृद्धा को भी बना लेता है। पुरुष को आपसी दुश्मनी या रंजिश निकालनी हो तो वे दूसरे परिवार की महिलाओं की इज़्ज़त तार-तार कर प्रतिशोध लेता है और जो ये नही करता वो अपनी कुंठा मिटाने के लिए माँ और बहन की गाली दे कर संतुष्टि पा लेता है हालांकि किसी स्त्री के सम्मान या इज़्ज़त का मापदंड योनि नही होना चाहिए ऐसे मेरे विचार है, शायद सबको समझना भी चाहिए।

 धार्मिक ग्रंथों में भी स्त्रियों की स्थिति


भारतीय समाज में धार्मिक ग्रंथों में भी स्त्रियों की स्थिति में विरोधाभास है, उदारहण के लिए, महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या पर देवराज इंद्र आसक्त हो गए और छल कपट से अहिल्या का सामीप्य और शारीरिक समर्पण पा लिया, जिसका दण्ड पति द्वारा अहिल्या को मिला पुरुष बेदाग निकल गया। सीता को अग्नि परीक्षा देने के बाद भी उनके पति द्वारा त्याग दिया गया। वैदिक काल मे मनुवादी विचारधारा ने समाज को जकड़ लिया, स्त्री के सारे अधिकार समाप्त कर दैहिक पवित्रता के मानदंड कठोर से कठोरतम हो गए। यहां तक कि आज भी कई क्षेत्रो में लड़की की पवित्रता को परखने के लिए शादी की पहली रात सफेद चादर बिछाई जाती है। भारतीय समाज में महिलाओं के सम्मान में बेशक देवी व माता जैसे शब्दों के संबोधन का ढोल पीटा जाता रहा हो परन्तु सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है।

बलात्कार के बाद समाज में पीड़िता की स्थिति 

बलात्कार जैसे घिनोने कृत्य को बलात्कार पीड़ित महिलाये बुरे सपने की तरह भुलाना भी चाहे तो ये  सुसभ्य समाज अपने जहरीले कटाक्षों से पीड़िता का सीना भेद-भेद कर याद दिलाता रहता है। समाज के व्यंग्य बाणों को सहते हुए यदि वह न्याय के लिए न्याय-व्यवस्था की ओर बढ़ती भी है तो न्याय व्यवस्था के प्रथम चरण पुलिस वालों की सशंकित दृष्टि से घायल हो जाती है। पुलिस के अजीब और संदेहजनक प्रश्नों से वह स्वयं को ही अपमानित महसूस करती है। रही सही पूरी कसर अदालत में अपनी प्रतिभा साबित करते हुए वकील बलात्कार पीड़िता का अपने कुतर्को से कई बार बलात्कार करते है। वकील बलात्कार पीड़िता को चरित्रहीन साबित करने मे अपनी पूरी प्रतिभा और ताकत झोक देते है और कई प्रकरण में तो अपूर्ण साक्ष्यों के कारण व संभावनाओ के स्तर पर पीड़िता को न्याय तक नसीब नही हुआ।

बलात्कार पीड़िता का ये समाज जीना दुर्भर कर देता है, पीड़िता एवं उसके परिवार का बहिष्कार करने लगता है। पीड़िता पर ही समाज की उंगली उठती है उसका चरित्र हनन होने लगता है कई लोग अपने कुतर्को द्वारा पीड़िता को ही दोषी ठहराते है। उससे शादी करने के लिये कोई तैयार नही होता। उसकी स्वतंत्रता, स्वछंदता, दिनचर्या एवं कपड़ो के आधार पर सवालो के कटघरे में उसे खड़ा कर देते है। यहां तक कि अन्य महिलाओं को सुरक्षा के नाम पर घरों में कैद कर दिया जाता है। उनकी स्वतंत्रता छीन ली जाती है।

स्वतंत्र मानसिकता

कुंठित मानसिकता के पुरुषों द्वारा ऐसे घिनोने कृत्य को अंजाम दिया जाता है। परंतु इस कारण सभी पुरुषो को सवालों के घेरे में लेना न्यायसंगत नही हैं। इसी समाज में स्वतंत्र मानसिकता के पुरुष भी हैं जो महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए प्रयासरत है, हाँ ये सच है, कि कम हैं। हालाँकि बलात्कार पीड़िता को परेशान और दुखी करने में महिलाएं भी पीछे नही है। बलात्कार रोकने के लिए हमे स्वतंत्र मानसिकता अपनानी आवश्यक है। जागरूकता का प्रसार करना होगा। अपने घर के पुरुषों से बात करनी होगी महिला सम्मान के बारे में अपने बेटों को समझाना होगा, उनमें पुरुष अहंकार हावी होने से बचाना होगा और महिला सम्मान के संस्कार डालने होंगे। मीडिया को भी जनता में जागरूकता लानी होगी।

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