क्या अपनी प्रेयसी बना पाओगे ?

 


वो धूल में सनी रहती है हमेशा ही
काम मे मशगूल रहती है हरदम
दूसरों के महल बनाने में व्यस्त
पसीने की दुर्गंध से महकती, वो मजदूर है
क्या तुम उसे अपनी प्रेयसी बना पाओगे?

वो ऊर्जावान मौत को मात देने वाली है
उसे प्रेम के नाम पर बर्बाद किया है 
उसी के सिरफिरे आशिक ने
फेंक दिया है उसे समाज ने खुद से अलग
उसके चेहरे को बना दिया गया भयानक
क्या तुम उसे अपनी प्रेयसी बना पाओगे?

अपनी भावनाओं को दफन कर लिया है 
उस प्यारी से मासूम लडक़ी ने 
जानती है वो, उसके प्रेम का कोई मोल नहीं
क्योंकि श्याम रंग किसी को पसन्द नहीं
क्या तुम उसे अपनी प्रेयसी बना पाओगे?

वो गंवार सी लड़की, उसे औपचारिकताएं नहीं आती
उसकी शिक्षा चढ़ गई है पितृसत्ता की भेंट
तुम्हारा सभ्य समाज शायद उसे न अपना पाए
वो ठेठ गांव की जिसे नही आते हैं शहरी नियम
क्या तुम उसे अपनी प्रेयसी बना पाओगे?

वो लड़की कल्पनाओं में कहीं रहती है
वो जानती है कि राजकुमारों को पसन्द है 
सिर्फ और सिर्फ छरहरी राजकुमारियां
इसीलिए उसने अपने स्थूल शरीर को 
कैद कर लिया है अपने ही ख्वाबों के कब्रगाह में
क्या तुम उसे अपनी प्रेयसी बना पाओगे

वो एक मायूस ठुकराई हुई औरत है
जिसे ये समाज हज़ारों उलाहने देता है
डायन कुलटा कह कर पुकारता है 
क्योंकि वो पति द्वारा छोड़ी गई औरत है
वो सिर्फ अपने बच्चों के लिए जीती है
क्या तुम उसे अपनी प्रेयसी बना पाओगे?

वो औरत सफेद कपड़े में लिपटी एक लाश है
समाज ने छीन लिया है उससे जीने का अधिकार
बना दिये हैं उसके लिए कठोर नियम धर्म के नाम पर
क्योंकि विधवाओं को अधिकार नही हैं 
रंगीन सपनों का,
  क्या तुम उसे अपनी प्रेयसी बना पाओगे?


वो एक ऐसी विद्रोही औरत है
जो उड़ाती है धज्जियां पाखण्ड की
देती है चुनौतियां इस पितृसत्ता समाज को
वो करती है प्रश्न, देती है तर्क बुद्धिमत्ता से
लोग उसे चरित्रहीन कहते हैं
क्या तुम उसे अपनी प्रेयसी बना पाओगे?